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मार्च, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

माता दंतेश्वरी और राजा अन्नम देव की कहानी

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राजा अन्नमदेव के रुकने से स्थापित हुई देवी                  काले ग्रेनाइट से बनी है छह भुजाओं वाली देवी  की  प्रतिमा  दंतेवाड़ा में मां दंतेश्वरी की षट्भुजी काले ग्रेनाइट की मूर्ति अद्वितीय है। छह भुजाओं में दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशूल और बाएं हाथ में घंटी, पद्य और राक्षस के बाल मांई धारण किए हुए हैं।                         यह मूर्ति नक्काशीयुक्त है और ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरुप है। मांई के सिर के ऊपर छत्र है जो चांदी से निर्मित है। वस्त्र आभूषण से अलंकृत है। द्वार पर दो द्वारपाल दाएं-बाएं खड़े हैं जो चार हाथ युक्त हैं।  जो अद्भुत और बहुत सुन्दर है।                        बाएं हाथ में सर्प और दाएं में गदा लिए द्वारपाल वरद मुद्रा में हैं। 21 स्तम्भों से युक्त सिंह द्वार के पूर्व दिशा में दो सिंह विराजमान हैं। यहां भगवान गणेश, विष्णु, शिव आदि की प्रतिमाएं विभिन्न स्थानों में स्थापित हैं। मं...

येसंग पाठ - 7 ( कपटी तांत्रिक और महाराज संग्राम शाह )

                           येसंग पाठ - 7                       बहुत पुरानी बात है कि महाराजा संग्राम शाह गोंडवाने के बावन गढ़ों की बागडोर सम्हालते हुए जब कल-कल बहती नर्मदा तट में बसा जबलपुर में स्थित गढ़ा कटंगा राज्य की गद्दी पर बैठा। जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। राज लोलुप्ता के कारण बाहर से आया हुआ एक महान तांत्रिक मदन महल की सघन पहाड़ी पर आकर भैरों बाबा की सेवा करते हुए योग साधना में लग गया।                      12 वर्ष तक तपस्या करने के बाद वह कपटी तांत्रिक पुजारी राजा संग्राम शाह से एकांत में बोला- हे राजन आप बहुत ही भाग्यशाली, समाजसेवी एवं पुण्यात्मा हैं। इसीलिये भैरों बाबा आप पर अत्याधिक प्रसन्न हैं। अब आप विशेष पूजा अनुष्ठान कर के भैरों बाबा से वरदान प्राप्त कर लें ।        परन्तु हे राजन इसके लिये आप मध्य रात्रि के समय ही अमावस्या की रात्रि को अकेले निःवस्त्र होकरबिना कोई अं...

सारूंग पाठ - 6

                      सारूंग पाठ - 6                               प्राचीन काल में माता कली कंकाली के 33 कोटी बच्चों से परेशान होकर शंभुशेक ने उन्हें कोयली कछार लोहागढ़ पर्वत गुफा में बारह वर्ष के लिये कैद की सजा सुनाकर उन्हें बंद कर दिया था।  उन्हें उचित मार्ग दर्शन दिलाने के लिये एक परम ज्ञानी महान बौद्धिक तत्ववेत्ता गुरु की आवश्यकता महसूस कर शंभुशेक ने पारी पटोर बिजलीपुरा के निवासी जालकादेव और उनकी  पत्नी हीरा देवी से उनका पुत्र जिसका नाम रूपोलंग था, उसे मांगना चाहा। एक दिन शंभुशेक जालकादेव के घर गये और उसे बताया कि हे जालकादेव तुम्हारा होनहार पुत्र बहुत ही भाग्यशाली और गुणवान है। जिसे मैं अत्यंत शक्तिशाली एवं कोया पुनेम (सगा समाज) का गुरु बनाना चाहता हूँ।                    जालकादेव और हीरा देवी शंभुशेक के भक्त थे जिसके कारण उनको पूरा विश्वास हो गया । उन्होंने अपने पुत्र को उनकी गोदी में सौंप दिय...

सांयुग पाठ -5 ( कथा माता कली कंकाली की)

                          सांयुग पाठ -5                              सांयुग पाठ - 5                      एक समय की बात है जब सोना माता गर्भावस्था में थीं। उस समय उनकी इच्छा कोंडवारी (केवलार भाजी) वनस्पति की कोमल कलियों की तरकारी खाने की हुई। लगातार एक सप्ताह तक वह इस तरकारी का सेवन करती रहीं, परंतु उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई।                       एक दिन, अपनी सेविकाओं के साथ, सोना माता कोंडवारी की कोमल कलियों को तोड़ने के लिए पास के जंगल में चली गईं। वहां, रास्ते में उनका पैर फिसल गया, और वह जमीन पर गिर पड़ीं। गिरने से उनके उदर में झटका लगा, जिससे वह दर्द के कारण तड़पने लगीं।                      सेविकाओं ने माता की पीड़ा देखकर तुरंत कोंडवारी भाजी की कोमल कलियों की सेज तैयार की और उन्हें ...

नालुंग पाठ - 4

                         मूंद पाठ - 3              सर्वशक्तिमान फड़ापेन महाव्रत पूजा को समझकर राजा वीरशाह गुरु विक्रमदेव सहित समस्त प्रजा तथा समाज सेवकों व धर्माचार्यों को "दियागढ़" के परम रम्य पुण्य सत्नित्ना महागोंदा के तट पर फड़ापेन सर्वोच्च शक्ति फड़ापेन बड़ादेव का महाव्रत पूजा के लिये आमंत्रित किया ।  पूजा प्रारम्भ कर गुरु विक्रम देव ने कोया पुनेमी मंत्रों द्वारा समस्त देवी-देवताओं की स्तुति कर सभी श्रद्धालु भक्तों को पुनेमी आस्था के अनुरूप फड़ापेन शक्ति का दर्शन कराया। तभी राजा के हृदय में यह लालसा उत्पन्न हुई, वे बोले हे गुरुदेव अब फड़ापेन की महिमा एवं स्वरूप के बारे में बताइए किस प्रकार जीवों का जगत में जन्म, पालन एवं संहार होता है। व कोवा पुनेम में कौन-कौन से बंदनीय तत्व होते हैं। तथा संक्षेप में यह भी बताईये कि फड़ापेन शक्ति के चमत्कार के कारण सगा समाज में कौन-कौन सी प्रमुख आस्थायें हैं।       तब गुरु विक्रम देव ने कहा हे राजन आपने फड़ापेन की महिमा एवं कोया प...

मूंद पाठ -3 ( सर्वोच्च शक्ति का आमंत्रण )

             मूंद पाठ - 3              सर्वशक्तिमान फ़ढ़ापेन महाव्रत पूजा एक अद्वितीय आध्यात्मिक आयोजन है, जिसमें राजा वीरशाह ने गुरु विक्रमदेव सहित समस्त प्रजा, समाज सेवकों और धर्माचार्यों को "दियागढ" के पुण्यस्थल, महागोंदा नदी के तट पर आमंत्रित किया। इस आयोजन का उद्देश्य फ़ढ़ापेन बड़ादेव की महिमा का बखान और उनकी शक्ति के दर्शन कराना था। पूजा का शुभारंभ गुरु विक्रमदेव ने कोया पुनेमी मंत्रों के उच्चारण से किया। इन मंत्रों के माध्यम से उन्होंने समस्त देवी-देवताओं की स्तुति की और श्रद्धालुओं को फ़ढ़ापेन शक्ति के दर्शन कराए। पूजा के दौरान, राजा वीरशाह के मन में यह लालसा उत्पन्न हुई कि वे फ़ढ़ापेन की महिमा, स्वरूप, और सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को विस्तार से जानें। उन्होंने गुरु से यह भी पूछा कि कोया पुनेम के अंतर्गत कौन-कौन से बंदनीय तत्व आते हैं और समाज में फ़ढ़ापेन शक्ति के चमत्कार से कौन-कौन सी आस्थाएँ प्रमुख हैं। गुरु विक्रमदेव ने राजा वीरशाह और उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा, "हे राजन, आपने फ़ढ़ापेन की महिमा और कोया पुन...

रण्ड पाठ - 2 (अध्याय - 2)

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                            रण्ड पाठ - 2                         सर्वशक्तिमान फड़ापेन (बड़ादेव) महाव्रत पूजा प्रक्रिया को समझाते हुए गुरु विक्रम देव ने कहा हे , राजन यह पूजा सम सगा गोत्र वालों को विषम सगा गोत्र वालों के द्वारा एवं विषम सगा गोत्र वालों को समसगा गोत्र वालों से अपना कोया पुनेम गुरु या प्रचारक से सम्पन्न कराना उत्तम माना गया है।                 इस महाव्रत पूजा के दिन श्रवण करने वाले दम्पत्ति व सगाजनों को चाहिए कि उस दिन निराहार रहकर सत्य नेम से फड़ापेन (बड़ादेव) में चित्त लगाकर दिवस बिताये पूजा के समय सात रंगों का प्रयोग कर चौक के दो भाग करे, प्रथम बाएँ में फड़ापेन शक्ति के नाम से (सल्लार गांगरा) तथा ७५० कुल गोत्रों सहित "जयसेवा मंत्र" अंकित करें।             द्वितीय दो भाग में सातों सगा देवताओं का प्रतीक अलग-अलग आड़े पट्टियों रंगों से भड़े। तत्पश्चात चौक के चारों कोन...